Thursday, January 29, 2009

प्रथम प्रवक्ता का ०१ फरवरी के अंक में

[ वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभाष जोशी का स्तम्भ "लाग लपेट" ]
क्योंकि पूंजीवाद का सत्यम मिथ्या है
प्रभाष जोशी
आगे अ लगा कर सत्यम को असत्यम बनाना जितना आसान है लगता है उतना ही आसान झूठा मुनाफा दिखाना और उसे लेखा परीक्षकों से पुष्ट करवा लेना भी है। और यह मत कहिए कि हिसाब किताब के बही खातों में ऐसी घोटालेबाजी भारत में ही संभव है। सत्यम एक बहुराष्ट्रीय आईटी कंपनी है। उसके शेयर जैसे मुंबई के शेयर बाजार में कारोबार के लिए सुलभ हैं वैसे ही न्यूयार्क के शेयर बाजार में। अमेरिका की ही प्रतिष्ठित और ख्यात नाम लेखा परीक्षक कंपनी प्राइसवॉटर हाउस सत्यम के हिसाब किताब की जांच करती थी।
फिर गए साल जब पंद्रह सितंबर को वॉल स्ट्रीट का दिवाला निकला तो पता चला कि लालच की मारी अमेरिकी कंपनियां भी ऐसे ही घोटाले कर करके निवेशकों और नियामकों को उल्लू बना रही थीं। मेरिल लिंच और एआईजी जैसी सबसे प्रतिष्ठित वित्ताीय और निवेशक कंपनियां घोटाले करने में सबसे आगे थीं। इसलिए अमेरिका या यूरोप की कंपनियों को ईमानदारी, पारदर्शिता और जवाबदेही के मामले में उदाहरण की तरह नहीं रखा जा सकता। बहुत संभव है कि सत्यम के भूतपूर्व और अब गिरफ्तारशुदा चेयरमैन रामलिंग राजू ने अपनी कंपनी को ज्यादा मुनाफा कमाने और इसलिए शेयर बाजार में बहुत कीमती और भरोसेमंद बनाए रखने के गुर अमेरिका में ही सीखे हों। वहीं के ओहियो विश्वविद्यालय से उनने एमबीए किया है और अमेरिका में उनका लंबा चौड़ा कारोबार था।
पांच सौ फार्च्यन कंपनियों में से 185 सत्यम की ग्राहक थीं। छियासठ देशों में उसका कारोबार था। कोई तिरपन हजार लोग उसमें काम करते थे। टाटा कंसलटेंसी सर्विसेज, इंफोसिस और विप्रो के बाद सत्यम चौथी सबसे बड़ी आईटी कंपनी थी। कारपोरेट काम काज में दिया जाने वाला सबसे बड़ा पुरस्कार सत्यम को एक नहीं दो बार मिल चुका है। दूसरा गोल्डन पीकॉक तो गए साल ही मिला था। भारत की ऐसी प्रतिष्ठित कंपनी में हिसाब-किताब का कोई सात हजार करोड़ का घोटाला निकला। कंपनी ने शेयर बाजार में कोई दस हजार करोड़ डुबवा दिए। महामंदी के इस कठिन वक्त में उसने भारतीय कारपोरेट की प्रतिष्ठा को जबरदस्त चोट पहुंचाई है। हजारों करोड़ के इंजेक्शन लगा कर भारत सरकार ने हाल ही में अपने उद्योग व्यापार को जीवित करने की कोशिश की थी। सत्यम के घोटाले ने बाजार में निवेशकों के भरोसे की खटिया खड़ी कर दी है। सत्यम के शेयर तो डूबे ही शेयर बाजार को भी बड़ा झटका लगा है।
सत्यम के चेयरमैन रामलिंग राजू ने स्वीकार किया है कि हिसाब से यह खेल कई बरसों से चल रहा था। उनने माना है कि कंपनी को उतना फायदा हो नहीं रहा था जितना हिसाब के बही खाते में दिखाया जा रहा था। किताबों में दिखाया जाने वाला यह फर्जी मुनाफा सालों में बढ़ता-बढ़ता पांच हजार करोड़ से ज्यादा हो गया। कोई पौने चार सौ करोड़ रुपया तो इस फर्जी मुनाफे पर ब्याज का ही हो गया। कोई सवा हजार करोड़ की और देनदारियां थीं जो दिखाई नहीं गई थी। राजू ने कहा कि गए साल की दूसरी तिमाही में लाभ सिर्फ 61 करोड़ का हुआ था जब कि किताबों में वह 649 करोड़ रुपयों का दिखाया गया।
रामलिंग राजू ने कहा कि हिसाब-किताब में इस फर्जीवाड़े से उनने खुद एक पैसा भी नहीं बनाया न कंपनी के दूसरे निदेशकों को कोई लाभ मिला। यानी वास्तव में न होने वाला मुनाफा हिसाब में इसलिए दिखाया गया कि कंपनी को बड़ा लाभ कमाने वाली बताया जा सके ताकि शेयर बाजार में उसके शेयर ऊंची कीमत पर बने रहें और पैसे लगाने वाले लोग और वित्ताीय संस्थाएं उसमें पैसा लगाने को हमेशा तैयार रहें। नव उदार जमाने में मुनाफा ही चूंकि सारे पाप धो देने वाला गंगाजल माना जाता था इसलिए सत्यम को खड़ा कर के चलाने वाले रामलिंग राजू फर्जी मुनाफे पर अपनी कंपनी को चमकाए रखे हुए थे। इस फर्जी मुनाफे को वास्तविक बनाने का जब उन्हें कोई रास्ता दिखाई नहीं दिया तो उनने खुद ही मंजूर कर लिया कि यह फर्जीवाड़ा हो रहा थ। गए साल अपने बेटों की कंपनियां मस्तास इनफ्रा और मस्तास प्रापर्टीज खरीदने की जो पेशकश राजू ने की थी वह इसीलिए कि फर्जी भुगतान दिखा कर सचमुच के संसाधन पाए जा सकें। लेकिन सत्यम के निदेशकों और बोर्ड ने यह खरीदी होने नहीं दी।
अब आप सोच रहे होंगे कि राजू झूठा मुनाफा दिखा कर अपराधा जरूर कर रहे थे। लेकिन यह तो अपनी कंपनी को चमकाने और बाजार में उसे ऊपर थिगाए रखने के लिए किया जा रहा था। एक जमाना था जिसे लाइसेंस परमिट राज कहा जाता था और जब ज्यादा लाभ कमाने की छूट नहीं थी तब उद्योगपति और व्यापारी अपने उद्योग और व्यापार से पैसा निकाल कर अपने पास रख लेते थे और उद्योग व्यापार में फर्जी घाटा दिखाया करते थे। जो पैसा वे निकाल लेते थे वह उनका नंबर दो का पैसा हो जाता था। उनका तो पैसा बन जाता था लेकिन उद्योग व्यापार में घाटे चलता था तो टैक्स की भी बचत हो जाती थी।
लेकिन अब तो कमाने पर छूट है और खुले बाजार के नवउदार पूंजीवाद ने मुनाफे को मोक्ष की जगह दे दी है। इसलिए अपनी कंपनी को और ज्यादा मुनाफा कमाने लायक बनाने के लिए मालिक लोग झूठा मुनाफा दिखाते हैं। शेयर बाजार में कंपनी का शेयर ऊंचा चढ़ा रहता है और लोग पैसा लगाने को हमेशा तैयार रहते हैं। पहले झूठा घाटा दिखाने का जमाना था। अब झूठा मुनाफा दिखाने का जमाना आ गया है। इसे देखते हुए यह जरूर कहा जाएगा कि रामलिंग राजू ने अपराध किया था। लेकिन यह अपराध कंपनी के हित और निवेशकों की भलाई के लिए किया गया था। और इसलिए रामलिंग राजू को इसे स्वीकारने में कोई बड़ी मुश्किल नहीं हुई।
लेकिन क्या राजू की स्वीकारोक्ति को सही मान लेना चाहिए? सत्यम के हिसाब-किताब की जांच शुरू हो गई है और नया बोर्ड भी सरकार ने बैठा दिया है। जांच से ही पता चलेगा कि सही क्या है। लेकिन शंका बनी हुई है कि क्या राजू सचमुच फर्जी मुनाफा दिखा रहे थे? या यह भी कंपनी से मुनाफा निकाल कर दूसरे काम धंधों में लगाने की चाल थी? शंका इसलिए हो रही है कि राजू ने कहा कि पिछले साल की दूसरी तिमाही में सत्यम को तीन प्रतिशत का लाभ हुआ था जब कि उसने उसे चौबीस प्रतिशत दिखाया था। यानी वास्तविक लाभ 61 करोड़ का हुआ था जबकि दिखाया गया 649 करोड़ का।
मामला यहीं से बिगड़ता है। क्योंकि लोग मानने को ही तैयार नहीं हैं कि सत्यम सिर्फ तीन प्रतिशत के मुनाफे पर कारोबार कर रहा था। छोटी से छोटी आईटी कंपनी भी बीस से तीस प्रतिशत के मुनाफे पर काम करती है। इंफोसिस तैंतीस प्रतिशत मुनाफे के मार्जिन पर काम कर रही थी। सत्यम के ग्राहक फार्चुन की 185 कंपनियां हैं और इतने बड़े, इतने ग्राहकों की कंपनियां इतने कम मुनाफे पर काम नहीं करतीं। यानी गए साल की दूसरी तिमाही में मुनाफे का वास्तविक मार्जिन राजू ने जो तीन प्रतिशत कहा है वह फर्जी है। उसे इतना कम इसलिए स्वीकारा गया कि जो खूब मुनाफा हुआ होगा उसे दूसरे धंधों में लगाने के लिए निकाला गया होगा। और यह सिलसिला कई सालों से चल रहा होगा। राजू के बेटे बिल्ंडिग उद्योग में गए हैं जिसमें कि मुनाफे का मार्जिन आईटी उद्योग से कहीं ज्यादा है। हैदराबाद में मेट्रो बनाने का ठेका वही लोग ले रहे थे। यानी सत्यम का मुनाफा दूसरे ज्यादा मुनाफा देने वाले उद्योगों में लगाया जा रहा था और कंपनी के पैसे को निजी किया जा रहा था।
सच क्या है यह तो जांच के बाद ही पता चलेगा? लेकिन एक बात सच है कि जमाना लाइसेंस परमिट राज का हो या खुले बाजार के नवउदार पूंजीवाद का। मुनाफा और खूब मुनाफा कमाने वाले उद्योगपति और व्यापारी के लालच का कोई पारावार नहीं है। हर उद्योगपति और व्यापारी की इच्छा ज्यादा से ज्यादा मुनाफा कमाने की और उस मुनाफे को अपना निजी मुनाफा बताने की होती है। उसे ऐसा करने से रोकने के लिए बोर्ड पर स्वतंत्र निदेशक बैठाने, लेखा परीक्षकों से सख्त नजर रखने, सेबी जैसे नियामक बनाने और सरकार में कंपनी मामलों का अलग से मंत्रालय खोलने जैसी कोशिशें की गई हैं। सत्यम का घोटाला सबूत है कि निदेशक, कंपनी सेक्रेटरी, लेखा परीक्षक और वित्ताीय अधिकारियों को बनाया जा सकता है। राजू को झूठा मुनाफा दिखाने या सत्यम का मुनाफा निकाल कर दूसरे कामों में लगाने से कोई रोक नहीं सका।
अमेरिकी बिजली कंपनी एनरॉन में हिसाब-किताब के ऐसे ही घोटाले पकड़े जाने के बाद बड़े सख्त लेखा कानून बने। लेकिन पिछले साल सितंबर में हमने देखा कि अमेरिका की नामी गिरामी और बड़ी-बड़ी कंपनियां ऐसे ही घोटाले कर रही थीं और उन पर किसी भी नियामक का कोई नियंत्रण या अनुशासन काम नहीं कर रहा था। इसलिए जब तक दिवाला नहीं निकला कोई जान नहीं सका कि क्या घोटाला हो रहा है। चार महीने बाद भी पता नहीं चला है कि कौन क्या घोटाला कर रहा था। भारत में भी सत्यम के रामलिंग राजू जो कर रहे थे वे दूसरे उद्योगपति, व्यापारी और उनकी कंपनियां कर रही हैं या नहीं कोई नहीं जानता।
सब मान रहे हैं कि लालच और काले को धोला और धोले को काला करने की इच्छा ही इस महामंदी और महाघोटालों की असली वजह है। नियम कायदे, नियामक, नियंत्रक, परीक्षक और अंकुश लगाने वाले सब फेल हो गए हैं। फिर भी पूंजीवाद के पैरोकार कह रहे हैं कि मुनाफा कमाने की पूरी छूट होनी चाहिए और उद्योग व्यापार पर कोई सरकारी नियंत्रण नहीं होने चाहिए। कहते हैं लालच ही आदमी को कमाने और विकास करने को प्रेरित करता है। लेकिन लालच पर कोई सच्चा अंकुश स्वीकारने को कोई तैयार नहीं होता।
सत्यम का कारोबार झूठ निकला क्योंकि पूंजीवाद का सत्य झूठ पर टिका हुआ है। जब तक आप इसे मानेंगे नहीं उद्योग-व्यापार के सत्यम में ऐसे ही घोटाले होते रहेंगे।

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